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नहीं आएगा बदलाव – Jagran Junction Forum

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“हे दुर्भाग्यशालिनी,
समाचार मुखप्रष्ठ पर तुम्हारी अवधि अब समाप्त,
चुनाव, सचिन, टी-२०, अब विषय हैं पर्याप्त.
लज्जित हूँ मैं पर ये है मेरा आश्वासन,
एक दिन और दूंगा तुम्हें, यदि जीवन करो परित्याग.”

आज जब ये लेखनी उठाई है तो उसकी मृत्यु का समाचार आ चुका है. हृदय की हुंकार मुझे बरबस कुछ दिन पूर्व इन स्वरचित पंक्तियों का स्मरण करा चली.

और आज उसके जीवन परित्याग पर नव-वर्ष की आहट पुन:, विस्मृति की आशंका और प्रगाढ़ कर देती है.

प्रत्येक आघात पर कुछ दिन छटपटाना और फिर भूल जाना हमारी जीवनशैली बन चुके हैं. हमने इस ह्रदय में भोपाल त्रासदी को छुपाया है, मंडल की लपटों से घिरी कायाओं को धुएं में उड़ाया है, निठारी के बाल-कंकालों को हमने अपनी शैया दफनाया है, मुंबई हमले को भूल क्रिकेट को गले से लगाया है, अन्ना के अनशन पर हमने पेट भर खाया है, किसानों की आत्म-हत्याएं हमारे जीवन में कोई महत्व नहीं रखतीं, और तो और हमने तो भ्रष्टाचार को भी धर्म जैसा अपनाया है.

संभवत: ये विस्मृतियाँ ही हमारे जीवित रहने का कारण हैं, अन्यथा आघात तो इतने हैं कि संपूर्ण जीवन को आन्दोलनों की भेंट चढ़ा दें.

किन्तु क्या इस क्रोध, प्रतिरोध एवं प्रतिशोध रहित जीवन को हम सार्थक कह सकते हैं?
आक्रोश में जीवन की क्षति है परन्तु आक्रोश का दमन क्या सदैव एक नए आक्रोश को जन्म नहीं देता?
जीविका एवं परिवार का भरण-पोषण आवश्यक है, किन्तु हम ये क्यों भूल जाते हैं कि व्यवस्था का अगला आखेट हमारे इसी परिवार का भी कोई सदस्य हो सकता है.
यदि ये सब सत्य हैं और हम इनसे सहमत हैं तो हर बार ऐसा क्यों होता है?
हमारी स्मरण-शक्ति इतनी दुर्बल तो नहीं?

निश्चित ही हम भूलना नहीं चाहते.
कदाचित कोई कारक शक्तियाँ हैं जो हमें भूलने को बाध्य करती हैं. हमें सर्व-प्रथम उन कारणों को खोजना होगा.

आंकड़े बताते हैं कि ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते’ वाले इस देश में औसतन हर ४० मिनट में एक बलात्कार होता है. यदि इन परिस्थितियों में भी हम ‘मेरा भारत महान’ के नारे कह कर देश के भावी ‘सुपर पावर’ बनने का सपना देख सकते हैं तो निश्चित ही हम बलात्कार को एक सामान्य घटना मान चुके हैं.

फिर आज ये इतना अधिक हल्ला क्यों? कदाचित उस युवती ने प्राण बचाने के लिए समर्पण कर दिया होता या फिर इतनी गंभीरतम हाथापाई ना हुयी होती, कदाचित उन युवकों ने लोहे की छड़ से युवती के गुप्तांगों को फाड़ कर आंतें निकालने जैसा जघन्यतम कार्य ना किया होता या फिर जाड़े की उस ठिठुरती रात में उन दोनों को पूर्णतया नग्न अवस्था में चलती बस से नीचे ना फेंक दिया होता, यदि एक सरल बलात्कार के पश्चात उन दोनों को किसी स्थान पर सुरक्षित उतार दिया जाता तो संभवत: आज इसे भी हम सामान्य घटना मान कर भूल चुके होते. आखिरकार सिर्फ एक बलात्कार पर इतना रोष प्रकट करना तो हमारी प्रकृति नहीं.

आखिर कब हम इतने असंवेदनशील हो गए? निश्चित ही हमारी सोच में ये परिवर्तन एक दिन में नहीं हुआ.
आगे चलते हैं. इस घटना से जुड़े कुछ और तथ्यों पर सोचते हैं.

आज जबकि ये एक भीषण जन-आन्दोलन का रूप ले चुका है, इसके पश्चात भी अनेक अवसरों पर हमें पुलिस की कार्य-क्षमता एवं कार्य-प्रणाली में अनेकों कमियाँ दिखाई दीं. सरकारी तंत्र द्वारा स्थिति एवं मीडिया के नियंत्रण में असमर्थता दृष्टिगोचर हुयी. संदेशों एवं संबोधनों में विलम्ब तथा विसंगतियां पायी गयीं. इतने गंभीरतम घटनाक्रम और विकटतम जनाक्रोश होने पर भी इतनी घोर विफलताएं?

आखिर कब हमारा प्रजातंत्र इतना दुर्बल और अक्षम हो गया? निश्चित ही ये परिवर्तन भी एक दिन में नहीं हुआ.
चलिए आगे चलते हैं. कुछ और तथ्यों पर सोचते हैं.

आज जबकि इस आक्रोश ने देशव्यापी आन्दोलन का रूप ले लिया है तब ये तो लगभग सुनिश्चित ही है कि उन आरोपियों को फांसी होगी. फिर आज उसकी मृत्यु ने तो न्याय-प्रक्रिया को और सरल कर दिया है.
पर फिर भी ये आन्दोलन थमता क्यों नहीं?
क्यों आज भी हम अपने आपको संदेहों में घिरा पाते हैं?
क्यों हमें ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार, अपने तंत्र की गलतियों को छुपाना चाहती है?
क्यों हमें प्रतीत होता है कि सरकार इसलिए फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है कि कोई अन्य संगठन इसका श्रेय ना ले जाए?
क्यों हमें ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपियों को दंड सिर्फ इसलिए मिलेगा क्योंकि वे किसी VIP के संबंधी नहीं हैं?
क्यों हमें ऐसा प्रतीत होता है कि दंड मिलने में बहुत देर की जायेगी या फिर यदि हमने आन्दोलन रोक दिया तो इसे भी ठंडे-बस्ते में डाल दिया जाएगा?
क्यों हमें ऐसा प्रतीत होता है कि इन आरोपियों को दंड मिलने पर भी, थोड़े दिनों पश्चात फिर ऐसी घटनाएं प्रारम्भ हो जायेंगी?
क्यों इतने संदेह? क्यों हमें अपने ही देश की व्यवस्था पर विश्वास नहीं होता?

आखिर कब हमारा विश्वास हमारी ही व्यवस्था से उठ गया? निश्चित ही ये विश्वास भी हमने एक दिन में नहीं खोया.

निश्चित ही ये सब कई वर्षों से चली आ रही धीमी प्रक्रियाओं के परिणाम हैं जो आज हम इतने असंवेदनशील, इतने दुर्बल, इतने अक्षम और इतने संदेही हो गए, या यूं कहें कि हम अब स्मरणहीन हो चले.

प्रश्न उठता है कि ये सब तो सरकार को करना था, अब हम क्या कर सकते हैं? आखिर हमसे त्रुटि कहाँ हुयी? हम तो फांसी के क़ानून की मांग कर ही रहे हैं ना?

जिस देश में प्रतिवर्ष हज़ारों बलात्कार की प्राथमिकी ‘दर्ज’ होती हों और पूर्व २० वर्षों में केवल ३ फांसी हुयी हों, जहां के सर्वोच्च नागरिक फांसी के प्रति असीम उदारता का भाव रखते हों, जहां फांसी के नाम पर धार्मिक एवं जातीय संगठन उठ खड़े होते हो, जहां मानवता को कलंकित करने वाले अपराधी को भी फांसी एक अमानवीय कृत्य माना जाता हो, जहां सजा के विचार पर राजनैतिक समीकरण बनते बिगड़ते हों, वहाँ फांसी की सजा से कितना लाभ होगा यह वाद-विवाद का विषय है.

त्रुटि नियम-कानूनों में नहीं, वरन इनके पालन में है. इन्हें कठोरता से कार्यान्वित करने में है. प्राथमिकी दर्ज करने में आनाकानी, अपराधी को पकड़ने में देरी और प्रार्थी से वसूलने में चुस्ती, जांच रिपोर्टों में अनेकों त्रुटियाँ, न्यायालय कर्मियों की असमय अनगिनत छुट्टियां, अनंत काल तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रियाएं और VIP के लिए कानूनों में विशिष्ठ सुविधाएं हमारी कानून-व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं.

यदि “न्याय में देरी अन्याय के समान है” के सिद्धांत को मानें तो भारत में न्याय अभी भी प्रतीक्षित है. और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं भारत के न्यायालयों में चल रहे लगभग करोड़ों प्रतीक्षित मुकदमे.

यह प्रतीक्षा हमारा बहुमूल्य समय है. और सब जानते हैं कि समय सब कुछ भुला देता है. संभवत: इसीलिये हम हर बार सब कुछ भूल जाते हैं. हम इस बार भी भूल जायेंगे. फिर से थाम लेंगे जीवन की लगाम, नारा फिर भी होगा ‘मेरा भारत महान’.



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ANAND SHARMA के द्वारा
February 17, 2013

व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, और समाज से राष्ट्र की कल्पना साकार होती है..!! किसी भी गुड वर्क के लिए परिवार, समाज और रास्ट्र सभी को खुशी और गौरव का एहसास होता है..!! क्या, बेड वर्क के लिए, कोई एक ही व्यक्ति ज़िम्मेदार होता है..? नहीं, सभी बराबर के भागीदार होते हैं..!! राज परिवार में, 14 वर्ष, राज्य से बाहर जीवन यापन, क्या सामान्य स्टोरी जैसा लगता है..? जेल में बंदी, माता और पिता को, संतान का सुख, कितना सुखद रहा होगा, इसकी कल्पना, क्या सहज और आसान है..? भाग्य में भागीदार सभी हैं, तो दुर्भाग्य में कौन है..? ‘सांच’ को ‘आंच’ क्या..???????

yogi sarswat के द्वारा
December 31, 2012

जिस देश में प्रतिवर्ष हज़ारों बलात्कार की प्राथमिकी ‘दर्ज’ होती हों और पूर्व २० वर्षों में केवल ३ फांसी हुयी हों, जहां के सर्वोच्च नागरिक फांसी के प्रति असीम उदारता का भाव रखते हों, जहां फांसी के नाम पर धार्मिक एवं जातीय संगठन उठ खड़े होते हो, जहां मानवता को कलंकित करने वाले अपराधी को भी फांसी एक अमानवीय कृत्य माना जाता हो, जहां सजा के विचार पर राजनैतिक समीकरण बनते बिगड़ते हों, वहाँ फांसी की सजा से कितना लाभ होगा यह वाद-विवाद का विषय है. कोशिश तो हो ही रही है,बदलाव भी आएगा ही! अभी भले ये बदलाव छोटा लगेलेकिन आने वाला कल अच्छा साबित हो, यही सोचा जा सकता है !

    johrip के द्वारा
    January 2, 2013

    अपनी प्रतिक्रया एवं विचार प्रकट करने के लिए अति धन्यवाद योगी जी. सत्य कहा आपने “आने वाला कल अच्छा साबित हो, यही सोचा जा सकता है”. जब मैं अपनी रचना का शीर्षक ‘नहीं आयेगा बदलाव’ रखता हूँ तो मन में कहीं न कहीं ये विचार अवश्य रहता है कि काश मैं गलत साबित होऊँ और बदलाव आये. क्षमा प्रार्थी हूँ, परन्तु मेरे व्यक्तिगत विचारों के अनुसार ये अभी भी वाद-विवाद का ही विषय है. कभी समय ने अनुमति दी तो मैं इस विषय पर विस्तार से चर्चा करूंगा.


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