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सी-सैट - हिन्दी-विरोधी बनाम अंग्रेज़ी-वादी

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    सी-सैट पर इसके पूर्व लिखे गये मेरे लेख की अनेकानेक प्रतिक्रियाएँ मुझे फेसबुक पर मिलीं. मुझे इस बात का दुख है कि उन सभी प्रतिक्रियाओं में अधिकतर मेरे विचारों को हिन्दी विरोधी एवं अँग्रेजीवादी समझा गया, जो कि एकदम ग़लत है.

    कुछ लोग भारतीय प्रशासनिक सेवाओं को सभी क्षेत्रीय भाषाओं में कराने के पक्ष में हैं. कुछ को लगता है कि भारत में अँग्रेज़ी से काम ही नहीं चलेगा क्योंकि इसके जानने वाले ७-९% ही हैं. कुछ लोगों ने प्रश्न किया है, “क्या इस अंग्रेज़ी ज्ञान को पाने के लिए हमें अपने देश की सारी भाषा संस्कृति को बदलना होगा ?क्या हमें अपने देश की शिक्षा का माध्यम ही परिवर्तित कर देना होगा ?हिन्दी और भारतीय भाषाओं के स्थान पर क्या अंग्रेज़ी का प्रभुत्व स्थापित करना होगा ?आखिर कितना समझौता करना होगा ?” कुछ लोगों का ये भी मानना है, “विश्व के किसी भी देश में एक भाषा नहीं रही है -कई भाषाएं रही हैं ,जिनमें से एक भाषा वहाँ की राजभाषा या राष्ट्रभाषा बनाई गई है, और भारत की स्थिति इससे अलग नहीं हो सकती.” कुछ लोगों का ये भी मानना है, “ये परीक्षा सभी भारतीय भाषाओं में अनिवार्य होनी चाहिए, तभी हम इस देश के सामान्य नागरिक को समान अधिकार देने में कामयाब हो पाएंगे अन्यथा सत्ता सन 1947 से पूर्व की भाँति ही 5%या7% अंग्रेज़ी जानकारों के पास ही रह जाएगी और देश की बहुसंख्यक जनता गरीब की गरीब ही बनी रह जाएगी”.

    आपके विचारों के सम्मुख मैं अपने कुछ तर्क रखूँ, इससे पहले मैं इस सी-सैट विरोधी आंदोलन की कुछ पृष्ठभूमि बताना चाहता हूँ. इस आंदोलन का मुख्य कारण संघ लोक सेवा आयोग की नितांत उत्तरदायित्व हीनता थी. यह आयोग अँग्रेज़ी में तैयार प्रश्नों के अनुवाद इंटरनेट से करवाता है और हास्यास्पद नमूने पेश करता है। ‘कॉन्फिडेंस बिल्डिंग’ का अनुवाद ‘विश्वास भवन’ और ‘स्टील प्लांट’ का अनुवाद ‘इस्पात का पौधा’ करना निहायत शर्मनाक था. इस प्रसंग को कुछ तुच्छ राजनीतिकारों ने अपनी अलौकिक क्षमताओं से ‘भारतीयता विरोधी’, ‘हिन्दी विरोधी’ और ‘अँग्रेज़ी दासता प्रतीक’ जैसे प्रसंगों में कब परिवर्तित किया पता ही नहीं चला. क्षेत्रीयता की आग भड़काकर अपनी रोटी सेंकने वाले राजनैतिज्ञों ने इसे प्रादेशिक भाषाओं के तिरस्कार से भी जोड़ दिया.

    बस फिर क्या था, हम सारे हिन्दी के समर्थक अपनी अपनी तलवारें लेकर उठ खड़े हुए. कम तैयारी वाले क्षात्रों को तो जैसे अपनी अक्षमता छुपाने का बहाना ही मिल गया. एक अच्छा भारतीय एवं हिन्दी समर्थक होने के नाते मैं प्रतिक्रिया स्वरूप कही गयी अधिकतर बातों से सहमत हूँ पर क्षमा चाहता हूँ, इसका अर्थ ये नहीं कि मैं अँग्रेज़ी विरोधी हूँ. और कदाचित् यहीं से हमारे मतभेद प्रारंभ होते हैं.

    भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं के विकास का समर्थक मैं भी हूँ पर ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा’ में नहीं. क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग ‘उनके राज्य’ की प्रशासनिक सेवाओं में होना चाहिए, पर ‘भारतीय’ सेवाओं में मात्र हिन्दी या अँग्रेज़ी ही होनी चाहिए.

    एक प्रशासनिक अधिकारी को अपने आप को तीन संदर्भों अथवा मंचों पर प्रस्तुत करना होता है. ‘राजकीय’, ‘राष्ट्रीय’ एवं ‘अंतरराष्ट्रीय’. राजकीय संदर्भों में वो अपनी क्षेत्रीय भाषा को प्रयोग कर सकता है. राष्ट्रीय संदर्भों में उसे अँग्रेज़ी एवं हिन्दी उपयोग करनी ही होगी. इसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में अँग्रेज़ी के बिना काम नहीं चलेगा.

    अपनी इस बात को मैं एक उदाहरण के माध्यम से कहता हूँ. जब नरेंद्र मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री के पद का कार्यभार संभालते हैं तो वो आसानी से सारे कार्य गुजराती भाषा में कर सकते हैं. परंतु एक प्रधानमंत्री लाल-किले से गुजराती में भाषण देता हुआ कैसा लगेगा. उन्हें मात्र अँग्रेज़ी या हिन्दी में से ही एक भाषा चुननी होगी. ‘ट्रांसलेटर’ की सुविधा लेना भी अटपटा लगेगा. यही प्रधानमंत्री जब ‘ब्रिक्स’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पूरे विश्व के सम्मुख अपनी बात रखता है तो अँग्रेज़ी ही एकमात्र विकल्प है जो कि संपूर्ण विश्व को आकर्षित कर पायेगा. देश के स्वाभिमान अथवा अँग्रेज़ी के अल्पज्ञान के चलते एक आध संबोधन या बैठक में ‘ट्रांसलेटर’ की सुविधा लेकर हिन्दी प्रयोग की जा सकती है पर एक प्रशासनिक अधिकारी के सारे दैनिक कार्य-काज ‘ट्रांसलेटर’ की मदद से नहीं किए जा सकते, और ना ही ‘ट्रांसलेटर’ विश्व को उतना आकर्षित कर पाएगा. संपूर्ण विश्व ने समय की इस माँग को समझा है और संभवतः इसीलिए इस बार के ‘ब्रिक्स’ सम्मेलन में सभी देशों (चीन, रूस, ब्राज़ील, अफ्रीका और भारत) के प्रतिनिधियों ने अँग्रेज़ी भाषा का ही प्रयोग किया. और इस बार का ‘ब्रिक्स’ ही क्यों, यदि ध्यान से देखें तो आज सभी वैश्विक मंचों पर सभी देशों के प्रतिनिधि अँग्रेज़ी ही प्रयोग करते हैं.

    कभी-कभी हमें दुख हो सकता है की इतनी सारी भारतीय भाषाओं के होते हुए भी हम एक विदेशी भाषा पर निर्भर हैं. पर यहाँ भी हमारे क्षोभ का कारण हमारी विचारधारा ही है. आज पूरे २५० साल से विराजमान होने के बाद भी हम इसे विदेशी भाषा ही मानते हैं. आज हम अपने दैनिक जीवन में १ घंटे का समय भी, अँग्रेज़ी शब्द प्रयोग किए बिना नहीं निकाल सकते हैं. तब भी हम इसे विदेशी भाषा मानकर वास्तव में अपने आप को ही मानसिक कष्ट देते हैं, और कुछ नहीं. परिवर्तन संसार का नियम है. जब हम गुलाम थे तब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिन्दी (क्षेत्रीय भाषा तब भी नहीं) बोलना हमारा स्वाभिमान था, पर आज संभवतः ये हमारा अल्पज्ञान अथवा हेकड़ी कहलाएगी.

    हममें से अधिकतर अँग्रेज़ी विरोधी ऐसे लोग होते हैं जो अँग्रेज़ी बोलना सीखने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं. परंतु ऐसे लोग भी समय परिवर्तन की माँग को अच्छी तरह समझते हैं और इसीलिए अपने बच्चों को अँग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में ही पढ़ाते हैं.

    यदि राष्ट्रीय संदर्भों की बात करें तो इतनी सारी भाषाएँ होने पर हम गर्व अनुभव कर सकते हैं पर सच तो ये है कि इतनी विविधता हमारी प्रगति में बाधक सिद्ध हुई है. पहले से ही हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सवर्ण, हरिजन में बँटे देश को तुच्छ राजनैतिज्ञों ने तमिलों, मराठियों और हिन्दियों में बाँट दिया है. इसी विविधता के चलते आज भारत बिना राष्ट्रभाषा का एक गूँगा देश है. यही विविधता हिंदीभाषियों को महाराष्ट्र और तमिलनाडु से पलायित करती है. इसी विविधता के चलते गुजरात में जन्मे बच्चे का जन्म-प्रमाणपत्र कर्नाटक का स्कूल अस्वीकार कर देता है. यही विविधता मुंबई की लोकल ट्रेन से बिहारी को बाहर धक्का दे देती है. यही विविधता बंगलौर में ऑटो-रिक्शा चालक बनकर एक अ-कन्नड़ भाषी को लूट लेती है. यही विविधता किसी समारोह में बंगाली मित्रों के बीच से एक हिन्दी-भाषी को ऐकला कर देती है. यही विविधता जम्मू में आपके साथ हुए अपराध की पुलिस रिपोर्ट उर्दू में लिखती है. ये सूची बहुत लंबी है. और आश्चर्य की बात ये है कि उपरोक्त ‘लगभग’ सभी उदाहरणों में अँग्रेज़ी सर्वमान्य है. सारी समस्या क्षेत्रीय भाषाओं अथवा हिन्दी से ही है. मैं नहीं समझता कि भाषा के कारण इतनी समस्याएँ विश्व के किसी भी अन्य देश में होंगी. संभवतः इसी को समझते हुए महाकवि एवं लेखक भारतेंदु हरिशचंद्र ने ‘हिन्दी-हिंदू-हिन्दुस्तान’ का नारा दिया होगा.

    और अंत में ‘जहाँ का काम वहीं को छाजे’ को अपनाते हुए मैं पुनः यही कहूँगा क्षेत्रीय भाषा का हस्तक्षेप ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा’ में नहीं होना चाहिए. क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग ‘उनके राज्य’ की प्रशासनिक सेवाओं में होना चाहिए, पर ‘भारतीय’ प्रशासनिक सेवाओं में मात्र हिन्दी या अँग्रेज़ी ही होनी चाहिए.

    क्षेत्रीय भाषाएँ तुच्छ क्षेत्रीयता को बढ़ावा देती हैं और हमें कूप-मंडूकता की ओर धकेलती हैं, जबकि सर्वमान्य भाषाएँ हमें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अनुमोदन की ओर अग्रसित करती हैं और हमारी विस्तृत पहचान बनती हैं. और हमारी भाषाएँ यदि इतनी ही महान हैं तो हमें उनके खो जाने का इतना डर क्यों? अन्य भाषाओं का इतना विरोध क्यों? मैं और आप चाहे जितना भी वाद-विवाद और तर्क-वितर्क कर लें, “सरवाइवल ऑफ दा फिटेस्ट” का सिद्धांत यहाँ भी लागू होकर ही रहेगा.

    पंकज जौहरी.



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